जब कभी भी गीतकार संगीतकार जोड़ी का नाम जेहन में आता है तो शैलेन्द्र-शंकर जयकिशन, मजरूह-सचिन देव बर्मन, गुलज़ार राहुल देव बर्मन, आनंद बक्शी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का नाम उभरता है. इसी तरह अक्सर रफ़ी और नौशाद या किशोर और राहुल देव बर्मन, लता और मदन मोहन इत्यादि का नाम लिया जाता है। ये विडम्बना ही है की रफ़ी साहब के सर्वश्रेष्ठ गीत मदन मोहन के संगीत में आये हैं. इसी तरह से मुकेश को अक्सर शंकर जयकिशन के साथ गता हुआ पाया गया है पर उनका सर्वश्रेष्ठ कल्याणजी आनंदजी के साथ. जरा गौर करिये.
"ये दुनिया ये महफ़िल" (हीर-राँझा), "तुमसे कहूँ एक बात पैरों सी हलकी २" (दास्तान) या "मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली" (अनोखी रात) इत्यादि, इनमें आपको एक अलग ही रफ़ी नज़र आयेँगे. मदन मोहन साहब ने लता और रफ़ी का सबसे बेहतरीन उपयोग किया।
इसी तरह मुकेश के सारे बेहतरीन गीत कल्याणजी आनंदजी ने गवाए हैं.
"जिस दिल में बसा था प्यार तेरा", "हम छोड़ चले हैं महफ़िल को", "ज़ुबान में दर्द भरी दास्ताँ चली आई" आदि. मुकेश की दर्द भरी आवाज़ हमेशा इस जोड़ी में सबसे ज्यादा निखरी है. यकीं न आये तो किसी भी संगीत पोर्टल पर मुकेश के गाने सुन कर देखिए. ज्यादातर गीत कल्याणजी-आनंदजी के निर्देशन होंगे.
अब सबसे चौंका देने वाली बात जिस पर कई लोग सहमत नहीं होंगे. पर ये मेरे विचार हैं. किशोर कुमार को अक्सर राहुल देव बर्मन के साथ ही याद किया जाता है. इस जोड़ी ने एक से बढ़ कर एक "रोमांटिक" गीत दिए हैं श्रोताओं को. पर किशोर कुमार के सार्वभौमिक उपयोग लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने किया है. लगा न झटका. चलिए कुछ गीतों पर गौर करते हैं. किशोर कुमार को ज्यादातर मस्ती या रोमांटिक गीतों के लिए जाना जाता है. राहुल देव ने उनका उपयोग बहुत ही सीमित परिधि में किया.
किशोर कुमार का पहला ग़मगीन हिट गाना था, अजनबी तुम जाने पहचाने से लगते हो (रंगोली). इसी दौर में एक और गण हिट हुआ था, मेरे मेहबूब क़यामत होगी (मि X इन बॉम्बे). गौर करने की बात ये है की उस दौर में रफ़ी या मुकेश ही दर्द भरे गीतों के लिए फिट माने जाते थे . LP ने किशोर कुमार के इस प्रतिभा को उजागर किया था. इसी तरह किशोर कुमार की पहली क़व्वाली "हाल क्या है दिलों का न पूछो सनम" भी LP ने ही रचा था. पहला ग़ज़लनुमा गीत था "मेरे दीवानेपन की भी" (मेहबूब की मेहँदी). जहां बाकी संगीतकारों ने किशोर कुमार को ज्यादार रोमांटिक गानों में पिरोया LP ने उन्हें विविधिता दी. जिसकी वजह से RD ने भी उन्हें इस तरह के कुछ गीत गवाए। यहाँ पर विशेष रूप से "मेरा जीवन कोरा कागज़ (कोरा कागज़)" या "बड़ी सूनी २ (मिली)" का भी जिक्र करना होगा जिसमें किशोर कुमार का अलग ही रूप सामने आया. हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में "कल्याणजी आनंदजी", "लक्ष्मीकांत प्यारेलाल" और "जतिन ललित" कुछ ऐसे नगीने हैं जिनके साथ थोड़ा कम न्याय हुआ। जहाँ कल्याणजी आनंदजी, शंकर जयकिशन और सचिन देव बर्मन से छुप गए वही लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन से। यही हाल 90s में जतिन ललित के साथ हुआ जिन्होंने सबसे कर्णप्रिय गीत उस दौर में दिए पर वो ए आर रहमान के सामने दब गए।
यकीं नहीं आता न। कोई बात नहीं। ये सिर्फ मेरे विचार हैं.
